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Navratri विशेष: संकट में घिरे व्यक्ति को बचाती हैं मां दुर्गा, जानें नवरात्रि का महत्व

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Navratri जिसे दुर्गापूजा के नाम से भी जाना जाता है। वर्ष में चार नवरात्र कहे गए हैं पहला चैत्र, दुसरा आषाढ, तीसरा अश्विन और चौथा पौष माह में मनाया जाता है और चारों नवरात्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा (पहली) तिथि से प्रारंभ होकर नवमी तिथि पर्यन्त तक मनाया जाता है। जिसमें शारदीय नवरा़त्र का विशेष महत्व है और पुरे भारतवर्ष में लोग अपनी-अपनी परम्परा के अनुसार हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। चतुर्मास में होने वाली आपदा-विपदा से त्रस्त मानव शक्ति की उपासना करते हैं और विपत्तियों से बचाने के लिए मा जगदम्बा से आग्रह करते हैं।

मां जगदम्बा (दुर्गा) त्रैगुण संपन्न हैं और इनके तीन प्रकृति की पूजा की जाती है –

महाकाली तमो गुण, महालक्ष्मी रजो गुण और महासरस्वती सतोगुण संपन्न हैं और जो शक्ति इन तीनों गुणों को एक साथ धारण करती हैं उन्हें ही देव, दानव, नाग, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर और मानव आदि पुरे श्रद्धा भाव से पूजते हैं और याचना करते हैं कि विपत्ति रूपी राक्षस से हमारी रक्षा करें। त्रैगुण संपन्न मां दुर्गा के नौ रूपों का वर्णन शास्त्रों में बताया गया है सभी रूपों की अलग अलग महिमा बतायी गयी है। दुर्गा सप्तशती के कवच पाठ में लिखा है –
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।

तृतीयं चन्द्रधन्टेति कुष्माडेति चतुर्थकम ।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मनैव महात्मा ।।

नौ स्वरूप में पहला शैलपुत्री, दुसरा ब्रह्मचारिणी, तीसरा चन्द्रधन्टा चौथा कूष्माण्डा पांचवां स्कन्दमाता छठा कात्यायनी सातवां कालरात्रि आठवां महागौरी और नौवां सिद्धिदात्री हैं और ये सभी नाम सर्वज्ञ महात्मा वेदभगवान के द्वारा ही प्रतिपादित हैं।

वेदभगवान कहते हैं कि जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम संकट में फंस गया हो तथा इस प्रकार के अनेक भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में जाता हो उनका कभी कोई अमंगल नहीं होता है और शोक, दुख और भय की प्रप्ति नहीं होती ।

मां जगदम्बा को महामाया के भी नाम से जानते हैं। शास्त्रों में वर्णन है कि भगवान विष्णु की योगनिन्द्रारूपा जो भगवती महामाय हैं, उन्ही से यह जगत् मोहित हो रहा है । वे महामयादेवी ज्ञानियों के भी चित्त को बलपूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं । वे ही इस संपूर्ण चराचर जगत् की सृष्टि करती हैं तथ वही प्रसन्न होनेपर मनुष्यों को मुक्ति के लिए वरदान देती हैं । महामाया देवी को ही सनातनी देवी तथा संपूर्ण इश्वरों की भी अधीश्वरी हैं । ब्रह्माण्ड को धारण करने वाली माता को ही सृष्टिरूपा, स्थितिरूपा और संहाररूप को धारण करने वाली कहा गया है । नौरूप को धारण करने वाली और दसविद्याओं की ज्ञाता भी कहा गया है ।मां जगदम्बा को अजन्मा कहा गया है फिर भी इनका प्राकट्य अनेक प्रकार से होता है ।

यहां हम महिषासुर के बध हेतु प्राकट्य का संक्षेप में वर्णन करता हूँ –

महिषासुर ने देवताओं को पराजित कर स्वयं ही इन्द्र बन बैठा तब पराजित देवता ब्रह्म के शरणागत होकर उस स्थान पर गये जहां भगवान शंकर और विष्णु विराजमान थे और देवताओं ने अपनी व्यथा सुनायी और कहा सभी देवताओं के अधिकार छीनकर स्वयं महिषासुर सबका अधिष्ठाता बन गया है उसके बध का कोई उपाय सोचि । देवताओं की बात सुनकर विष्णु को क्रोध हुआ और चक्रपाणी के मुख से महान तेज प्रकट हुआ इसी प्रकार ब्रह्मा, शंकर एवं इन्द्रादि देवताओं के शरीर से भी बड़ा भारी तेज उत्पन्न हुआ और वह सब तेज मिलकर एक हो गया और एक नारी शक्ति के रूप में परिणत हो गया जिसके प्रकाश से तीनों लोकों में व्याप्त जान पड़ा । भिन्न-भिन्न देवताओं के तेज से शरीर के विभिन्न अंगों का निर्माण हुआ तत्पश्चात सभी देवों ने अपने-अपने प्रमुख अस्त्र-शस्त्र एवं वस्त्राभूषण अर्पित किये । माँ जगदम्बा ने अपनी उत्पत्ति के कारण को अंजाम तक पहुंचाया और राक्षसों का बध कर देवताओं के मन हर्ष उत्पन्न किये तथा सभी देवता अपने अधिकार को पुनः प्राप्त कर माता की बारंबार स्तुति करने लगे। देवताओं को विपत्तियों से निकालने वाली माता जगत-जननी संसार में पूज्य हैं और इनकी अराधना मात्र से विपत्तिरूपी राक्षस का नाश होता है। माता की अराधना सब अपने-अपने परम्पराओं के अनुकुल करते हैं नौ दिन का व्रत, चण्डीपाठ एवं कुमारी पूजन का विशेष महत्व है।

अष्टमी तिथि का विशेष विशेष महत्व है

अष्टमी तिथि को हवन कीर्तन का भी विधान है साथ ही कन्या को भोजन कराया जाता है एवं वस्त्राभुषण दिये जाते हैं अष्टमी की रात्रि तंत्र साधकों के लिए महत्वपूर्ण है । तंत्र साधक भी इस दिन अपनी साधना पूर्ण करते हैं तथा अपने मंत्र को सिद्ध करते हैं । अगर आप भी किसी मंत्रों का जप पीछे से करते आ रहे हैं तो आज उन मंत्रों का दशांश हवन करना चाहिए विशेष हवन के लिए आप लाल चन्दन, अष्टगन्ध, खीर, मधु, अनार के दाने हवन सामग्री में मिश्रित कर हवन कर
सकते हैं ।

कामना सहित विशेष कुमारी पूजन का विधान शास्त्रों में बताया गया है। शास्त्रों में दो वर्ष से दस वर्ष तक की कन्याओं के पूजन करने तथा सभी वर्णों के कन्यओं के पूजन का विधान बताया गया है ।

देश के कई क्षेत्रों में मां की प्रतिमा या कलश को प्रथमा तिथि को ही प्राण प्रतिष्ठा दी जाती है लेकिन कई क्षेत्रों में षष्ठी तिथि की रात्रि में प्राण प्रतिष्ठा दी जाती है और आम लोगों के दर्शन व पूजन की इजाजत होती है इसके पूर्व वैदिक ब्राह्मण ही उनकी पूजा अर्चना करते हैं कई जगहों पर प्रथमा तिथि से तथा कई जगहों पर सप्तमी तिथि से बलिदान की प्रथा है हर क्षेत्र के लोग अपनी परम्पराओं के अनुसार माता को प्रसन्न करते हैं । देश के उत्तर पूर्व क्षेत्र में माता के मंदिर में माता की मिट्टी की प्रतिमा बनाई जाती है जो दसमी तिथि को विसर्जित कर दी जाती है इस अवसर पर कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है लोग श्रद्धा पूर्वक माता की अराधना करते हैं और सप्तमी, अष्टमी व नवमी तिथि को उत्सव के रूप में मनाते हैं और दसमी तिथि को भावभिनी विदाई देते हैं तत्पश्चात मंदिर में जिस शिला या स्थान पर उनकी प्रतिमा स्थापित की जाती है उस सिला को ही वर्ष भर पूजते रहते हैं।

मां की महिमा को बता पाना असंभव है एक जन्म क्या कई युग भी इनकी महिमा का वर्णन करने के लिए कम है माता को योगमाया भी कहते हैं हम सभी चराचर जगत पर निवास करने वाले ही नहीं देवी देवता भी इन्हीं योगमाया के भवबन्धन में बंधे हुए हैं हम सभी माता की पूजा अर्चना करते हैं ताकि इनकी कृपा प्राप्त हो और हम माया की जाल से बाहर निकल कर प्रसन्न रह सकें । माता को अजन्मा कहा जाता है, हमारे शास्त्रों में इनका प्रादुर्भाव हुआ ऐसा लिखा गया है अर्थात पाप और पापियों का अन्त करने के लिए इनका प्रादुर्भाव होता है और जगत का कल्याण कर अन्तर्ध्यान हो जाती हैं, और हम सभी इनकी महिमा को गाते रहते हैं और इनकी पूजा अर्चना करते रहते हैं ताकि हमारे सभी पापों को हर लें सभी कष्टों को दुर करें और हम सभी अपने बन्धु-बान्धवों के साथ सुखी व प्रसन्न रह सकें

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