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करवा चौथ व्रत :जानें तिथि, मुहूर्त, धार्मिक महत्व और संपूर्ण पूजन विधि,By:-denikjiven

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पति-पत्नी के बीच विश्वास की डोर को मजबूती प्रदान करने वाला व्रत करवा चौथ(karwa chauth)27 अक्टूबर (शनिवार) को मनाया जाएगा। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को महिलाएं यह व्रत अपने पति के प्रति समर्पित होकर उनके लिए उत्तम स्वास्थ्य(well health),दीर्घायु (long life)एवं जन्म-जन्मांतर तक पुनः पति रूप में प्राप्त करने के लिए मंगल कामना करती हैं। पति-पत्नी के अटूट बंधन का यह व्रत हर विवाहित नारी के मन को एक सुखद अनुभूति के एहसास से सराबोर कर देता है।

  1. क्यों कहते हैं करवा चौथ(karwa chauth)
    करवा चौथ(karwa chauth) दो शब्दों से मिलकर बना है,’करवा’ यानि कि मिट्टी का बर्तन व ‘चौथ’ यानि गणेशजी की प्रिय तिथि चतुर्थी। प्रेम,त्याग व विश्वास के इस अनोखे महापर्व पर मिट्टी के बर्तन यानि करवे की पूजा का विशेष महत्व है,जिससे रात्रि में चंद्रदेव को जल अर्पण किया जाता है ।
  2. धर्म ग्रंथों में मिलता है वर्णन
    रामचरितमानस के लंका काण्ड के अनुसार इस व्रत(karwa chauth) का एक पक्ष यह भी है कि जो पति-पत्नी किसी कारणवश एक दूसरे से बिछुड़ जाते हैं, चंद्रमा की किरणें उन्हें अधिक कष्ट पहुंचती हैं। इसलिए करवा चौथ के दिन चंद्रदेव की पूजा कर महिलाएं यह कामना करती हैं कि किसी भी कारण से उन्हें अपने प्रियतम का वियोग न सहना पड़े। महाभारत में भी एक प्रसंग है जिसके अनुसार पांडवों पर आए संकट को दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण के सुझाव से द्रौपदी ने भी करवाचौथ का पावन व्रत किया था। इसके बाद ही पांडव युद्ध में विजयी रहे।
  3. इसलिए निहारते है छलनी से चांद  
    भाव भरे मन से (karwa chauth)पूजा के उपरांत व्रती महिलाएं छलनी में से चांद को देखती हैं। इसके पीछे पौराणिक मान्यता यह है कि वीरवती नाम की पतिव्रता स्त्री ने यह व्रत किया। भूख से व्याकुल वीरवती की हालत उसके भाइयों से सहन नहीं हुई,अतः उन्होंने चंद्रोदय(moon rise) से पूर्व ही एक पेड़ की ओट में चलनी लगाकर  उसके पीछे अग्नि(fire) जला दी,और प्यारी बहन से आकर कहा-‘देखो चाँद निकल आया है अर्घ्य दे दो।’ बहन ने झूठा चांद देखकर व्रत खोल लिया जिसके परिणामस्वरूप(as a result) उसके पति की मृत्यु हो गई। साहसी वीरवती ने अपने प्रेम और विश्वास से मृत पति को सुरक्षित रखा। अगले वर्ष करवाचौथ के ही दिन नियमपूर्वक व्रत का पालन किया जिससे चौथ माता ने प्रसन्न होकर उसके पति को जीवनदान दे दिया। तब से छलनी में से चांद को देखने की परंपरा आज तक चली आ रही है।
  4. पूजन विधि
    सबसे पहले नारदपुराण के अनुसार महिलाएं वस्त्राभूषणों से विभूषित हो सांयकाल में (karwa chauth)भगवान शिव-पार्वती, स्वामी कर्तिकेय,गणेश एवं चंद्रमा का विधिपूर्वक पूजन करते हुए नैवेद्य अर्पित करें। अर्पण के समय यह कहना चाहिए कि ''भगवान कपर्दी गणेश मुझ पर प्रसन्न हों।''और रात्रि के समय चंद्रमा का दर्शन करके यह मंत्र पढते हुए अर्घ्य दें, मंत्र है- ''सौम्यरूप महाभाग मंत्रराज द्विजोत्तम, मम पूर्वकृतं पापं औषधीश क्षमस्व मे।''

    अर्थात हे! मन को शीतलता पहुंचाने वाले, सौम्य स्वभाव वाले ब्राह्मणों में श्रेष्ठ, सभी मंत्रों एवं औषधियों के स्वामी चंद्रमा मेरे द्वारा पूर्व के जन्मों में किए गए पापों को क्षमा करें। मेरे परिवार में सुख शांति का वास रहे। मां पार्वती उन सभी महिलाओं को सदा सुहागन होने का वरदान देती हैं, जो पूर्णतः समर्पण और श्रद्धा विश्वास(trust) के साथ यह व्रत(karwa chauth) करती हैं। पति को भी चाहिए कि पत्नी को लक्ष्मी स्वरूपा मानकर उनका आदर-सम्मान करें क्योंकि एक दूसरे के लिए प्यार और समर्पण भाव के बिना यह व्रत अधूरा है।

  5. करवा के साथ गणेश जी की कथा क्यों सुनी जाती है?
    ऐसा कहा जाता है कि कथा कभी भी अकेले नहीं सुननी चाहिए इसलिए करवा के साथ गणेशजी की कथा भी सुनी जाती है. गणेश जी को बच्चे का रूप माना जाता है और हम उस दिन ख़ुद को पार्वती का रूप मानते हैं. करवाचौथ (karwa chauth)का व्रत स्त्री के पति और मां के बेटे के लिए रखा जाता है यानी सास अपनी बहू से कहती है कि तुम मेरे बेटे की लंबी उम्र के लिए व्रत रखो. फिर आगे चलकर आप भी अपने बेटे के लिए अपनी बहू से व्रत रखने को कहेंगी, इसीलिए गणेशजी की पूजा की जाती है,निष्कर्ष ताकि हमें एक पत्नी और एक मां की शक्ति भी मिल सके.

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